कितनों के सब-के-सब दूध् के दाँत भी
न टूटे होंगे, न गाड़े गए होंगे ज़मीन में
मूँछें भी नहीं करियाई हैं पूरी तरह अभी
ऐसे एक से बढ़कर एक मिलेंगे पिअक्कड़
कि काहे को आए, आए तो इस रास्ते, हो जोगी !
सोच-सोच यहीं मरने लगेगी नानी
दोनों हाथों पकड़ दारू के पाउच
घेर लेंगे, नाचने, गाने लगेंगे
कर देंगे इस तरह अति अपने भजन-कीर्तन से-
आए हो बगिया में, मार के जाओ एक पाउच
कमा के धन का करोगे, हो जी !
ख़रीदोगे मेहरी की बनारसी साड़ी
ऐसे में हक-बक बंद, मन चिढ़ जाए
और पकड़े अगर खिसिया किसी की गर्दन
माँगने लगेंगे तुरंत, गिर पाँव पर माप़फी
पर पीछे से कउँचाएँगे कुछ ऐसे
कउँच-कउँच जाओगे, रे जोगी !
कि आए तो आए, काहे को भाय इस रास्ते
ये गाँव के ऐसे पिअक्कड़ हैं, जी संत !
जो एक ही गंजी-लुंगी पर कटा लेते पूरे साल
क्या गरमी, क्या बरसात, क्या ठंडी
पर बग़ैर पाउच न ही सकते, न मर सकते, हो !
तो हैं तो ये पिअक्कड़ ही, पर घर की
ये ही हैं उम्मीद भी पहली, दूसरी या आख़िरी
कहें क्या ! घर इनका आदी हो गया है इनका, हो !
कैसे-कैसे दो कौर खा सो जाते हैं माँ-बाप
और आधी रात तक देखते-ताकते आध चाँद
सुनते रहते हैं गाली भींगती हैं आँचल-गमछी
खटिया और खटिया की पाटी
कि बोले कौन, जो खाए दो लाठी बुढ़ारी में
इस ज़माने में, ऐ संत ! ऐसे हैं ये बुझक्कड़ पिअक्कड़
कहते जो कि चली गई है लक्ष्मी शहर में
सारे गाँव-जवार में नहीं है कहीं
न खेत-बधर, न बाग़-बगीचे, न ही मंदिर में
पर नहीं आता समझ में इन्हें, छोड़ गाँव, तोड़ नाता
जाएँ तो कहाँ और कैसे, रे जोगी !
फिर कोई पूछ सकता है, रे मेरे फकीर !
बने हुए है तब भी ये पिअक्कड़ कैसे ?
तो ट्रेन डकैती, बैंक डकैती, लूट-पाट
दिन-दहाड़े मार-काट, हत्या भी हैं करते
इनमें से कितनों ने सीख लिया है, सीख
गोली-बंदूक़-बम बनाना और बनना
उड़ती चिर्रइं को मार गिराना, है बाएँ हाथ का खेल
ये वो पिअक्कड़ तेरे-मेरे गाँव के, हो जी संत !
नाली में गिरते-पड़ते और लुढ़क-लुढ़क घर जाने की
हुल्लड़ई, पिअक्कड़ई के बावजूद
जो हैं करते कोशिश बाँध् पर दौड़-फाँद करने की
कि कहीं तो पुलिस-पलटन में लग जाए नौकरी
दू बिगहा बेच घूस देने को भी
हैं रहते तत्पर तैयार इनके बाप-मतारी
पर ख़ाली-ख़ाली बहाली से हैं लौटते जब
होत सुबह धेते हैं दारू से मुँह, जारते कलेजा
कि जब शान से जी नहीं सकते, हो मोर राजा !
मर तो सकते हैं शान से, हो मोर रानी !
अहो जोगी ! मेरे भाई ! शान से जीने-मरने वाले
हैं तो ये पिअक्कड़-अक्खड़, जी संत !
तभी तो आते हैं काम बहुत, बहुत
बदरंग चुनावी रंग रँगने, बदलने में
कि इस बार उगेगी फ़सल कहाँ, कैसी
भोट कहाँ किसको, कितना और कैसे
लगा ही लेते हैं अनुमान हर कवच भेद-छेद
पिरितिया के प्यारे, हो फकीर ! हैं तो ये वैसे
पिअक्कड़ ही नहीं, पिअक्कड़ के रे बाप
पर बजाओ तो हो संत ! अपनी सारंगी थोड़ी
कि देख इन्हें नहीं आती समझ, ग़ुस्सा करें कि पिघलें
झुक-सी, गड़-सी जाती हैं, जी आँखें
बिन बारिश पाँक में, यहीं के यहीं, यहीं
ओह नहीं !... नहीं ! हो !
जोगी, अहो जोगी, हो फकीर !
लागे है कुछ ठीक नाहीं सारंगी तुम्हारी, तुम हारे
कोई तार ढीला पड़ गया है, मानते हो, प्यारे !
वरना न तुम बना सको और न यह सारंगी
ऐसा कैसे हो सकता है मेरे बंधु ! मेरे साथी !
अरे छोड़ो, रख दो अपनी सारंगी, अपनी बग़ल में अभी
कि ये पिअक्कड़ हैं, हैं पर अक्खड़, हैं लड़ैता
जी देखो तो, अजी ये प्रेमी भी तो हैं
अरे प्रेमपत्र की करते लिखनी, और लिखते बड़ी मेहनत से
आपस में एक-दूसरे के हैं पहुँचाते भी गँव से
संचार-युग में देखो-बूझो यह प्रेम-पत्राचार
और बात है यह, जो गए पकड़े झटके में टटके
खाते हैं मौत की मार, नाली में गाड़-गाड़
पर ई भी कवनो छोटी-मोटी-खोटी बात ना,
जोगियों के जोगी, हो जी संतों के संत !
कि जब इन्हें मालूम ही नहीं, भाई हो !
जाएँ तो कहाँ रे ! करें तो क्या हो !
ऐसे में रख ताक पर हर लोक-लाज संग प्रेमिका कहीं
चाहते हैं अगर भाग-परा जाना दूर-बहुत दूर
भले लौटें न लौटें पिफर कभी गाँव, लड़कैयाँ की छाँव
तो इस राह-डरार ही सही, मेरे पीर-फकीर !
कम-से-कम पिअक्कड़ तो नहीं चाहते बने रहना ताउम्र
बोल, तेरी क्या राय है, क्या बोलने को अकुलाता जी
मेरे जोगी ! मेरे संत ! अहो बंधु ! हो फकीर !
और तेरी यह सारंगी, धत तेरी की हद, ख़ैर बोल
क्या बोलती है यह, तेरी संगी साथी सारंगी रे प्यारे !