गुरुवार, ५ नवम्बर २००९

तब तो महो महो........


बल्ले से गेंद को पीटना
एक बडा काम है
और उसे पीटते रहना
बहुत बडा काम
और उसे लगातार पीटते रहना
महान काम है

बीच बीच में अगर देश
पिट भी जाए
फिर भी लगातार पीटते रहना तो
महा महान काम है

गेंद को बल्ले से पीटे जाते देखना
अच्छा काम है
और उसे पीटे जाते निहारना
खूबसूरत काम है
और उसे देखते रहना अंत तक अनिमेष
तो साधना ही है एक
जिसके लिए दर्शकों को
बम्हर्षि की उपाधि
दी ही जानी चाहिए

गेंद को द्रविड पीटे तो
देश का नाम होता है
और उसे सिंह पीटे तो
बडा नाम होता है
पर अगर उसे पंडत पीटे
तब तो महो महो.........

बुधवार, ४ नवम्बर २००९

ये जिद क्‍यों है कि मुझको आर पार दिखे

आंख ही नहीं दिखती, कहां से इंतिजार दिखे
बारहा तनहाई की सूरतें हजार दिखें

ज्‍वार आता है चला भी जाता है
खिजां की रूत में वो ढूंढते बहार दिखे

भूले से भी ना लब पे आया जिक्र मिरा
अपनी सूरत ही उनको बार बार दिखे

हवाएं चलती हैं रूत भी बदलती है
वो शै कहां है जो हर पल बेकरार दिखे

दिखने को तो दिख जाती है हर सू वो ही
ये जिद क्‍यों है कि मुझको आर पार दिखे

रविवार, १ नवम्बर २००९

दाएं हाथ का दर्द और रोटी बनाने की कला - कविता


पॉलीथीन में डाल
सामने खूंटी से
लटका दी हैं रोटियां मैंने
कि नम रहें वो देर तक
और चींटियां भी ना पहूंच सकें वहां तक
पंद्रह साल पहले दीपक गुप्ता ने सिखाए थे ये ढब
रोटियां मुलायम रखने के
अब जबकि अरसा हुए उसे बेरोजगार से प्रोफेसर हुए
वह भी भूल चुका होगा ये ढब

ये रोटियों कुछ झुलसी सी हैं
अपने कवि मित्र सी एकसार
फूली पतली उजली रोटियों नहीं बना पाता मैं
वैसी निश्चिंतता नहीं मेरे पास
महानगर में एक मकान नहीं उसकी तरह
जिससे मरने पर ही बे‍दखल किया जासके
उसकी तरह बीबी नहीं समझदार
कि बिना झूमर पारे ठिकाना अलग कर ले
ना पटने पर
और वैसा मालिक भी नहीं जिसकी
कमजोरियां जानता है वह

सुंदर तो नहीं
पर कई कई तरह की रोटियां बनाता हूं मैं
प्रिय कवि ऋतुराज माफ करें
अपनी रोटियों को कला नहीं घोषित करना मुझे
कि भूख में भरपूर स्वाद के साथ उनका मौजूद रहना ही
काफी है मेरे लिए
कि कभी कभार हल्की घी चुपड लेता हूं उस पे
मां की दी हुयी
छालियों से तैयार दही को मथकर
निकालती है मां
छठे छमाही पाव भर घी
छठे छमाही दिल्ली से पटना जाने पर
थमा देती है छोटी सी प्लास्टिक की शीशी में
जिसे तीन महीने चला लेता हूं मैं
पता नहीं कैसे
खत्म ही नहीं होता मां का दिया पाव भर घी
बीच बीच में कहती हैं मां फोन कर
कि ध्यान रखिह देह के ......
इतना ही जाना है मां ने उम्र भर
देह का ध्यान रखना
पिता की देह का ध्यान रखा अब तक
अब बेटे की देह का ध्यान रखना चाहती है
मां मां
मैं ठीक हूं
रोज जमा लेता हूं दही ढाई सौ ग्राम
कि दिमाग ठंडा रहे
और तुम्हारी तरह
मेरी दाहिनी हाथ में भी दर्द रहता है अब
बराबर
और इस दर्द को पोसे रखना चाहता हूं मैं
याद में तुम्हारी
कि एक दर्द काटता है दूसरे दर्द को ...
आखिर इस दर्द में भी पछीटती रहती है मां
पिता के कपडे
पिता की रोटियां बेलती रहती है पचहत्तर की इस उम्र में
कि वेसी रोटियां बोल नहीं पाता कोई
जिसमें दाहिने हाथ का दर्द मिला हो

और मां
मेरी बनाई रोटियों
बेटों को भी पसंद आती हैं
खाते हैं वे सराह सराह कर
और आभा को भी बुरी नहीं लगतीं

कई कई तरह की रोटियों
बनाता हूं मैं
कभी तवे के आकार की
कभी प्लेट के आकार की
कभी सादी
कभी प्याज टमाटर नमक सानकर
कभी मकई के आंटे से बनी सी बडी और कडी
कभी सीधे आग पर सिंकी बिल्कुडल मुलायम

खा भी लेता हूं उन्हें
कई कई तरह से
कभी लहसुन के अचार से
कभी जैम से
कभी आमलेट से
और अक्सर सब्जी से

और याद करता हूं मीर को
कि जान है तो जहान है प्या रे
मीर अम्दन भी कोई मरता है ...

गुरुवार, २९ अक्तूबर २००९

एक तस्‍वीर को देखते हुए - कविता

अपना चेहरा मोडो तो ...



गहरे लाल और हल्‍के
धानी रंग की साडी में
बैठी हो तुम
अनिमेष
कहीं देखती हुयी
हल्‍का लाल टीका लगा रखा है तुमने
और तुम्‍हारे होंठ लाल हैं हल्‍के

मैं सोचता हूं
कि इससे पहले
कि समय यह ललाई चुरा ले
चूमकर
द्विगुणित कर दूं मैं उसे

कि तुम्‍हारे कान में कुछ कहूं
इतने हौले
इतने धीरे
कि अपना सिर मोडो तुम
और
छुला दो मेरे गालों से अपने गाल

कि जीवन के उजाड में
खिले पुष्‍पयुग्‍मों के
एक दृश्‍य में बदल जाएं हम

तुम्‍हारी पीठ पीछे
कैसा वीतराग सा
खडा है वह ठूंठ
किसी प्रतिस्‍पर्धा में नहीं वह
अंत और अनंत के प्रश्‍नों को धारे
वह तो बस छुपा रहना चाहता है
धानी चुनर और हरे पत्‍तों की होड के मध्‍य

तुम्‍हारे ठेहुने पर
कैसे टिके हैं
तुम्‍हारे हाथ
मैं इनकी यह बंद मुटठी
खोलना चाहता हूं
और धीरे से थमा देना चाहता हूं
अपना चेहरा

कि तुम जान सको
कि तुम्‍हारे इन तमाम रंगों का आग्रही
तुम्‍हारा एक हमनवा भी है

ऐसे में क्‍या करोगी तुम उस चेहरे का
मोडोगी अपनी निगाह
यह देखने को कि यह तुम्‍हारा स्‍वप्‍न
अब तक धडक रहा है
किसी प्रत्‍याशा में
कि उसके सूखे होठों पर
छुलाओगी अपनी उंगलियां
और अपना आंचल उघार
छुपा लोगी उसे अपने वक्षों के गुनगुनेपन में
अपने सौंदर्य की सुषमा में
सोने दे सकोगी उसे निर्विघ्‍न

कहां
क्‍या
देख रही हो तुम
देखो कि यह दृश्‍य
और भी गहरा हो सकता है
और भी सहज
कि तुम्‍हारे बाजू की खाली बेंच
कुछ कह रही है तुमसे
कि तुम्‍हारे साडी का पल्‍लू
बिखर कर जमीन छूना चाह रहा है
कोई हवा उसे संभलना चाहती है
कोई धूप उसमें खिलना चाहती है
कोई आग उसमें बलना चाहती है

अपना चेहरा मोडो तो
देखो
हवा संभाल चुकी है उसे
धूप खिल चुकी है उसमें
आग बल चुकी है...


Udan Tashtari
ने कहा…

तुम्‍हारी पीठ पीछे
कैसा वीतराग सा
खडा है वह ठूंठ
किसी प्रतिस्‍पर्धा में नहीं वह
अंत और अनंत के प्रश्‍नों को धारे
वह तो बस छुपा रहना चाहता है
धानी चुनर और हरे पत्‍तों की होड के मध्‍य


-बहुत गहरे उतारा इस रचना ने...एक अलग से भाव!!

बधाई..

सुग्‍गे के ठोर वाले ...कुमार वीरेन्‍द्र की कविताएं



एक

जब मैं
उसके बगीचे में जाता
वह वही आम
देती खाने को
जिस पर सुग्‍गे के
ठोर होते

वह आती
जब मेरे बगीचे में
मैं भी देता उसे
वही आम

वो ऐसे दिन थे
जब हमारे झोरे
बीजू आमों से भरे होते
और हम सुग्‍गे के ठोर वाले
एक आम के लिए
रह जाते दिन दिन भर
भूखे

दो

किसी दिन ऐसा होता
सिर्फ वह आती, मैं नहीं जा पाता
किसी दिन सिर्फ मैं जाता
वह नहीं आ पाती
किसी दिन तो ऐसा भी
होते अपने अपने बगीचे में
ताकते फिरते पेड पेड
कहीं बैठे कि नहीं सुग्‍गे
और न वह आ पाती
न मैं जा पाता

तब हम बिन बूझाए
बूझ जाते

कि आज उसे मिला,मुझे नहीं
कि आज मुझे मिला,उसे नहीं
कि आज मिले ही नहीं
हम दोनों में से किसी को
आम,सुग्‍गे के ठोर वाले

तीन

एक दिन उसके बाबू ने
उसका ब्‍याह तय कर दिया
एक दिन उसने बताया
सुग्‍गे के ठोर वाले आम देते
का सोचते हो...लो खाओ
बाबू कहते हैं, माई भी
तू पराई थोडे हुयी है
थोडे ही दिनों में बुला लेंगे

जिस रात उसकी बारात आयी
उसके घर के पिछवाडे बैठा
उसकी बकरी से बतिया रहा था
कभी कभी उसकी बकरी का मुंह
अंजुरी में ले
भीग भी लेता

फिर मैं
काका के पास
चला गया बगीचे में
और रात भर आम बीनता रहा
ज‍ब कि काका लाख कहते रहे
अभी जा - भोरे आना

भोर हुयी
और मैंने देखा
ओहार ओढे, ढकी
आ रही उसकी डोली
मैं टुकुर टुकुर देखता रहा
और आगे निकल गयी
उसकी डोली

निकल गयी इतनी दूर
धुंधलाने लगे कहार
लुपलुपाने लगी डोली
और मैं अभी भी
वहीं खडा,गडा रहा
देखता रहा दूर तक उसे
सुग्‍गे के ठोर वाला
हाथ में एक आम लिए

चार
एक

बहुत दिनों बाद
अपने कस्‍बे के एक अस्‍पताल में
एक बेड पर
मिली वह मरनासन्‍न

उसके सिरहाने
उसकी माई थी
बाबू गोडतारी
और पता नहीं
क्‍यों नहीं था कोई और
उसके लिए वहां

उसकी आंखें
बतियाते बतियाते
लबालब होने लगीं
फिर माई की, बाबू की
और मेरी भी

उसने कहा
मुझे एक आम खिलाओगे
सुग्‍गे के ठोर वाला
मैंने हां में सर हिला दिया
फिर निकल आया बाहर
और छलक रहा कनारों से

अपना कस्‍बा
इतना छोटा भी नहीं
एक से एक न मिलें आम
पर मैं घूमता रहा
कस्‍बे का हर आम बाजार
नहीं मिला कहीं
सुग्‍गे के ठोर वाला
एक भी

पर उसने मुंह खोला है
और कैसे जाउं खाली हाथ
पहली बार खोला है मुंह
एक बार फिर
घूमा पूरा कस्‍बा
और नहीं ही मिला
सुग्‍गे के ठोर वाला

पर खोला है मुंह
आम तो ले जाना ही है
ले लिया एक किलो
और उसके सिरहाने रखते कहा-
नहीं मिला सुग्‍गे के ठोर वाला
ढूंढने को खूब ढूंढा,नहीं मिला
वह मुस्‍कुराई,लेकिन इतना ही
जितना उसके खित्‍ते में
अब शेष थी

उसने एक आम निकाला
मेरे मुंह तरफ बढाया
और कहा- काटो
मैंने काटा तो आम पर
दातों के निशां उग आए
फिर अपने मुंह तरफ
ले जाते आम उसने कहा
तुमने तो कहा कि कहीं मिली ही नहीं
यह क्‍या है
क्‍या यह नही है
सुग्‍गे के ठोर वाला आम।

शुक्रवार, २३ अक्तूबर २००९

पिअक्कड़ - कुमार वीरेन्‍द्र - कविता

कितनों के सब-के-सब दूध् के दाँत भी
न टूटे होंगे, न गाड़े गए होंगे ज़मीन में
मूँछें भी नहीं करियाई हैं पूरी तरह अभी
ऐसे एक से बढ़कर एक मिलेंगे पिअक्कड़
कि काहे को आए, आए तो इस रास्ते, हो जोगी !

सोच-सोच यहीं मरने लगेगी नानी
दोनों हाथों पकड़ दारू के पाउच
घेर लेंगे, नाचने, गाने लगेंगे
कर देंगे इस तरह अति अपने भजन-कीर्तन से-
आए हो बगिया में, मार के जाओ एक पाउच
कमा के धन का करोगे, हो जी !
ख़रीदोगे मेहरी की बनारसी साड़ी
ऐसे में हक-बक बंद, मन चिढ़ जाए
और पकड़े अगर खिसिया किसी की गर्दन
माँगने लगेंगे तुरंत, गिर पाँव पर माप़फी
पर पीछे से कउँचाएँगे कुछ ऐसे
कउँच-कउँच जाओगे, रे जोगी !
कि आए तो आए, काहे को भाय इस रास्ते

ये गाँव के ऐसे पिअक्कड़ हैं, जी संत !
जो एक ही गंजी-लुंगी पर कटा लेते पूरे साल
क्या गरमी, क्या बरसात, क्या ठंडी
पर बग़ैर पाउच न ही सकते, न मर सकते, हो !
तो हैं तो ये पिअक्कड़ ही, पर घर की
ये ही हैं उम्मीद भी पहली, दूसरी या आख़िरी
कहें क्या ! घर इनका आदी हो गया है इनका, हो !
कैसे-कैसे दो कौर खा सो जाते हैं माँ-बाप
और आधी रात तक देखते-ताकते आध चाँद
सुनते रहते हैं गाली भींगती हैं आँचल-गमछी
खटिया और खटिया की पाटी
कि बोले कौन, जो खाए दो लाठी बुढ़ारी में

इस ज़माने में, ऐ संत ! ऐसे हैं ये बुझक्कड़ पिअक्कड़
कहते जो कि चली गई है लक्ष्मी शहर में
सारे गाँव-जवार में नहीं है कहीं
न खेत-बधर, न बाग़-बगीचे, न ही मंदिर में
पर नहीं आता समझ में इन्हें, छोड़ गाँव, तोड़ नाता
जाएँ तो कहाँ और कैसे, रे जोगी !
फिर कोई पूछ सकता है, रे मेरे फकीर !
बने हुए है तब भी ये पिअक्कड़ कैसे ?
तो ट्रेन डकैती, बैंक डकैती, लूट-पाट
दिन-दहाड़े मार-काट, हत्या भी हैं करते
इनमें से कितनों ने सीख लिया है, सीख
गोली-बंदूक़-बम बनाना और बनना
उड़ती चिर्रइं को मार गिराना, है बाएँ हाथ का खेल
ये वो पिअक्कड़ तेरे-मेरे गाँव के, हो जी संत !
नाली में गिरते-पड़ते और लुढ़क-लुढ़क घर जाने की
हुल्लड़ई, पिअक्कड़ई के बावजूद
जो हैं करते कोशिश बाँध् पर दौड़-फाँद करने की
कि कहीं तो पुलिस-पलटन में लग जाए नौकरी
दू बिगहा बेच घूस देने को भी
हैं रहते तत्पर तैयार इनके बाप-मतारी
पर ख़ाली-ख़ाली बहाली से हैं लौटते जब
होत सुबह धेते हैं दारू से मुँह, जारते कलेजा
कि जब शान से जी नहीं सकते, हो मोर राजा !
मर तो सकते हैं शान से, हो मोर रानी !

अहो जोगी ! मेरे भाई ! शान से जीने-मरने वाले
हैं तो ये पिअक्कड़-अक्खड़, जी संत !
तभी तो आते हैं काम बहुत, बहुत
बदरंग चुनावी रंग रँगने, बदलने में
कि इस बार उगेगी फ़सल कहाँ, कैसी
भोट कहाँ किसको, कितना और कैसे
लगा ही लेते हैं अनुमान हर कवच भेद-छेद
पिरितिया के प्यारे, हो फकीर ! हैं तो ये वैसे
पिअक्कड़ ही नहीं, पिअक्कड़ के रे बाप
पर बजाओ तो हो संत ! अपनी सारंगी थोड़ी
कि देख इन्हें नहीं आती समझ, ग़ुस्सा करें कि पिघलें
झुक-सी, गड़-सी जाती हैं, जी आँखें
बिन बारिश पाँक में, यहीं के यहीं, यहीं

ओह नहीं !... नहीं ! हो !
जोगी, अहो जोगी, हो फकीर !
लागे है कुछ ठीक नाहीं सारंगी तुम्हारी, तुम हारे
कोई तार ढीला पड़ गया है, मानते हो, प्यारे !
वरना न तुम बना सको और न यह सारंगी
ऐसा कैसे हो सकता है मेरे बंधु ! मेरे साथी !
अरे छोड़ो, रख दो अपनी सारंगी, अपनी बग़ल में अभी
कि ये पिअक्कड़ हैं, हैं पर अक्खड़, हैं लड़ैता
जी देखो तो, अजी ये प्रेमी भी तो हैं
अरे प्रेमपत्र की करते लिखनी, और लिखते बड़ी मेहनत से
आपस में एक-दूसरे के हैं पहुँचाते भी गँव से
संचार-युग में देखो-बूझो यह प्रेम-पत्राचार
और बात है यह, जो गए पकड़े झटके में टटके
खाते हैं मौत की मार, नाली में गाड़-गाड़
पर ई भी कवनो छोटी-मोटी-खोटी बात ना,
जोगियों के जोगी, हो जी संतों के संत !
कि जब इन्हें मालूम ही नहीं, भाई हो !
जाएँ तो कहाँ रे ! करें तो क्या हो !
ऐसे में रख ताक पर हर लोक-लाज संग प्रेमिका कहीं
चाहते हैं अगर भाग-परा जाना दूर-बहुत दूर
भले लौटें न लौटें पिफर कभी गाँव, लड़कैयाँ की छाँव
तो इस राह-डरार ही सही, मेरे पीर-फकीर !
कम-से-कम पिअक्कड़ तो नहीं चाहते बने रहना ताउम्र

बोल, तेरी क्या राय है, क्या बोलने को अकुलाता जी
मेरे जोगी ! मेरे संत ! अहो बंधु ! हो फकीर !
और तेरी यह सारंगी, धत तेरी की हद, ख़ैर बोल
क्या बोलती है यह, तेरी संगी साथी सारंगी रे प्यारे !

सोमवार, १९ अक्तूबर २००९

साम्राज्‍यवाद और कविता - कुमार मुकुल

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आज समाज दैनिक से

एक उदास सुलगती हुई शाम से - उमाशंकर सिंह - पहला ड्राफ्ट

नींद का लहू
बिखरा पडा है
मुंडे-तुडे बिस्‍तर की सिलवटों में
देह गीली हो गई है तपती हुई
एक उदास सुलगती हुई शाम से
उठता रहा धुंआ
आंख में गडता रहा
डूबा बहुत दूर उफनती हुई रात में
कतरा-कतरा बहता दरिया
कहां जमा ?

चादर की शक्‍ल में
तिलस्‍मी साम्राज्‍य के जाल की तरह
फैला है अंधेरे का स्‍याह कफन
सूरज सुबह करेगा इसकी सफेदी

नींद के रक्‍त मे लोट-पोट
धरती के बिछौने में
कई चीजों की मिली-जुली
अदृश्‍य चादर लपेटे
पुकारता रहा
कब आओगी प्रिय...
बुदबुदाता रहा किसी घिसे हुए
निष्‍फल मंत्र की तरह
कब आओगी प्रिय...

शनिवार, १७ अक्तूबर २००९

अक्‍सर सोचता हूं ... - अंजनी

अक्‍सर सोचता हूं
आज घर लौटकर बैठूंगा इत्‍मीनान से
और लिखूंगा एक लंबा पत्र
रोज रोज इकटठा दुख को।
और सुख की बयार को
उतार लाउंगा शब्‍दों में
बंद होते वाक्‍यों में बह चलेगी
मन:स्थितियों की धार
भेज दूंगा उन्‍हें दोस्‍तों के पास
जिन्‍होंने देखे थे
नदी के साथ कदमताल करते हुए ढेर सारे सपने
और एकदम पास-पास बैठकर लिखे थे
एक दूसरे को खत
पेन की अदला-बदली से पुख्‍ता करते थे
अपने-अपने भरोसे,आपसी उम्‍मीद...।

अक्‍सर सोचता हूं
दौड भाग की इस जिंदगी में जब भी मिल जाता है समय
मसलन,शाम को घर लौटते
ठसाठस भरी बस के एक कोने में खडे हुए
या अचानक ही किसी छुटटी के आ मिलने पर,
कि घर पहुंचते ही आज
मेज की गर्द को बुहार दूंगा
खरीद कर लाउंगा एकदम नई कॉपी
एक अच्‍छी सी पेन
जो लिखेगी साफ-साफ
शब्‍दों में चमक उठेंगे भाव,
कि दूध,चीनी,चायपत्‍ती का कर लूंगा जुगाड
सूरज के क्षितिज पर फैल आने तक लिखता रहूंगा
एक पूरी किताब
दिल में मुडे हुए पन्‍नों,हर्फों को
खोल लाउंगा
और भेज दूंगा उन्‍हें हमसफर दोस्‍तों के पास
जिन्‍होंने साइकिल के रेस में देखे थे जीत के सपने
जो बातों के सिलसिले में
खाते थे अक्‍सर ही समय से मात...
और कल मिलने के वादे में
सघन हो उठती थी रात।

अक्‍सर सोचता हूं
आज की शाम घर लौटकर बैठूंगा इत्मिनान से
एक अच्‍छी सी भाप उठती गर्म चाय के साथ
शहर के इस भंवर से निकलकर
महसूस करूंगा बचे होने का अहसास
शरीर के अस्थिपंजर को थहा दूंगा कहीं किनारे
बहुत सोचने-बहुत लिखने ..., के ख्‍याल से बचकर
नींद की अतल गहराइयों में उतर जाउंगा
और नर्म सुबह में आंख खुलने के पहले तक
देख आउंगा हमसफर पांवों के निशान...।

अक्‍सर सोचता हूं
इस शहर में सोचता ही रहता हूं अक्‍सर
बरस बीतते गये धरती के साथ साथ घूमते
लौटते,काटते गोल घुमावदार चक्‍कर
और मेरे भीतर
परत दर परत थहा रही हैं बातें
थहा रहे हैं सपने
ख्‍यालों से भर गया है दिल
कस रहा है आयतन।
ठसाठस भरी बस में
दबे पडे हैं हाथ-पांव,कमर में चुभ रहा है किसी का टिफिन
घर पहुंचने के पहले ही
देह के पोरों मे उतर आयी हैं नींद
बोलने के साथ ही
खुल उठती है अपनी ही देह में फांक
आंख में सिर्फ दृश्‍य
जिसके पीछे-पीछे जाना है कहीं भीतर...।

अक्‍सर सोचता हूं
और यह सोचना नहीं गया अब तक
अब तक पैरों के नीचे चुभती है जमीन
और आखों में ढलता है मौसम का मिजाज
अब तक उग रहे हैं देह पर सपनों के विरवे...।

अपना कारवां